wheat crop-Gehu ki kheti (pdf)

Detailed wheat crop-Gehu ki kheti (pdf)

wheat crop-Gehu ki kheti (pdf) | गेहूं की फसल, हरियाणा की एक महत्वपूर्ण अनाज वाली फसल है। वर्षा और जमीन की नमी के अनुसार राज्य में इसका क्षेत्रफल प्रति वर्ष घटता-बढ़ता रहता है। अब सिंचाई की सुविधाओ की उत्तरोत्तर वृद्धि होने के कारण गेंहू का क्षेत्रफल बढ़ कर 23.3 लाख हैक्टेयर हो गया है।

Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

विभिन अवस्थाओं के लिए गेंहू की उन्नत और बढियाँ दाने वाली किस्म निकालने के लिए अनुसंधान हो रहे है। सिंचिंत क्षेत्रों में गेंहू की उन्नत, बौनी किस्मो की पैदावार पहले ही काफी बढ़ चुकी है। कम उपजाऊ और वर्षा पर निर्भर अवस्थाओं में सी 306 (लम्बी किस्म) अपनी अधिक पैदावार और सूंदर दानो के कारण बहुत पसंद की जाती है, जो बाजार में अच्छी भावो पर भी बिकती है।  wheat crop

पिछले दशक में गेंहू के क्षेत्रफल, पैदावार तथा औसत पैदावार में सराहनीय वृद्धिहु हुई है। 

मिट्टी | Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

गेंहू विभिन प्रकार की मिट्टी में उगाया जाता है लेकिन अच्छे जल-निकास वाली मध्यम दोमट मिट्टी इसके लिए अच्छी है। खारी और सेम वाली भूमि इसके लिए ठीक नहीं है। धान के बाद गेंहू की बिजाई के लिए मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी है। अगर धान की कटाई  खेत में पर्याप्त नमी न हो तो पलेवा करना चाहिए। 

सिंचित भूमि में पहली जुताई मिट्टी पलट हल से तथा अगली जुताई आधुनिक तकनीक से लैश रोटावेटर के साथ या फिर डिस्क हैरो से करना काफी रहता है। अंतिम जुताई के बाद अगर डिस्क हैरो  किया गया है

तो भूमि की परत को समतल बनाने के लिए और नमी बनाये रखने के लिए दो बार सुहागा लगाना चाहिए। अगर जुताई रोटावेटर के साथ की गयी है तो सुहागा लगाने की जरूरत को रोटावेटर पूरा कर देता है।

बीज की मात्रा| Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

बीज की मात्रा, किस्म, बिजाई के समय तथा बिजाई की स्थितियो के अनुसार बदलती रहती है। अच्छी पैदावार लेने के लिए छोटे आकार के बीज वाली किस्मो (प्रति 1000 दानो का भार 38 से 44ग्राम) जैसे

डब्लू एच 147, डब्लू एच 542 व डब्लू एच 416 के लिए 40 किलोग्राम तथा मोटे आकार की बीज वाली किस्मो  (प्रति 1000 दानो का भार 50 ग्राम से अधिक) जैसे डब्लू एच 157 व सोनालिका के लिए 50 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की दर से सिफारिश की जाती है।

डब्लू एच 283 के लिए 45.0 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ डालना चाहिए। देर से बिजयी करने पर 25% बीज अधिक मात्रा में डालना चाहिए।

छिड़काव विधि द्वारा बिजाई करने पर समय पर की गई बिजाई की अच्छी पैदवार लेने के लिए बीज की मात्रा 40 की बजाय 50 किलो प्रति एकड़ व पछेती बिजाई के लिए 60 किलो प्रति एकड़ की सिफारिश की गई है।

बड़े दानो वाली किस्मो, जैसे डब्लू एच 283, डब्ल्यू एच 157 सोनक, यु पी 2338, राज 3765 व सोनालिका के लिए 25% बीज अधिक डाले।

बिजाई का समय | Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

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Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

अच्छी पैदावार लेने के लिए गेंहू की बिजाई सही समय पर करनी चाहिए। बिजाई का समय राज्य के विभिन्न खण्डों  की जलवायु पर निर्भर करता है। बारानी हालातो में 306 व डब्ल्यू एच 533 की बिजाई अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर के पहले सप्ताह तक कर लेनी चाहिए। सिंचित हालातो में बिजाई नवंबर के तीसरे सप्ताह तक कर सकते है।

डब्ल्यू एच 157, डब्ल्यू एच 283, डब्ल्यू एच 147, डब्ल्यू एच 416 तथा डब्ल्यू एच 542 किस्मो की बिजाई का सही समय नवंबर के अंतिम सप्ताह से लेकर दिसंबर के दूसरे सप्ताह तक का है। दिसंबर का तीसरा सप्ताह गेंहू की बिजाई के लिए लाभकारी नहीं होता। कठिया (डयूरम) गेंहू की बिजाई का उत्तम समय अक्टूबर के अंतिम सप्ताह से नवंबर का प्रथम सप्ताह है।

बिजाई विधि | Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

गेंहू की बिजाई, बीज एवं उर्वरक ड्रिल से करनी चाहिए। यदि यह उपलब्ध न हो तो सिंचित क्षेत्रो में गेंहूँ की बिजाई केरा विधि से तथा असिंचित क्षेत्रो में पूरा विधि से करनी चाहिए। सीड-कम-फर्टिलाइजर ड्रिल की बिजाई से पहले केलिब्रेशन कर लेना चाहिए।

सीड ड्रिल सही ढंग से सेट करे जैसे की लम्बी बढ़ने वाली किस्म की बिजाई 6-7 सै.मि. गहरी की जा सकती है, जबकि अन्य किस्मो को 5-6 सै.मि. गहरा बोना चाहिए। समय से की जाने वाली बिजाई में दो खूढो का फासला 20 सै.मि. रखे।

पछेती बिजाई के लिए दो खूडों की आपसी दुरी 18 सै.मि. कर देनी चाहिए। सामान्य बिजाई की स्थिति में सिफारिश की गई बीज मात्रा में रेतीली या हल्की भूमि में ड्रिल द्वारा आडी (दो तरफा) बिजाई की जा सकती है।

धान-गेंहूँ फसल-चक्र वाले क्षेत्रों में गेंहूँ  की जीरो टिल सीड कम फ़र्टिलाइज़र ड्रिल से बिजाई (खेत  की बिना जुताई किए जीरो टिल मशीन से गेंहूँ की बिजाई) करनी चाहिये। 

धान के बाद आने वाली गेंहूँ की फसल को खेत की जुताई किए बगैंर जीरो टिल मशीन से बोने पर निम्नलिखित लाभ मिलते है। 

  1. आइसोप्रोटूरोन प्रतिरोधी कनकी का उचित प्रबंध। 
  2. परम्परागत बिजाई के मुक़ाबले अधिक पैदावार। 
  3. अगेती बिजाई करने पर और भी अधिक पैदावार।  
  4. जुताई, मजदूरी और डीज़ल खर्च घटता है। 

सिंचाई | Gehu ki kheti (pdf)

हरियाणा में 5 से 6 बार सिंचाई करनी चाहिए। जब उर्वरक ज्यादा मात्रा में दिये जाते है तो तशल्ली कर ले कि सिंचाई के लिए काफी पानी उपलब्ध है या नहीं। गेंहूँ की बौनी किस्मो में ज्यादा उर्वरक दिए जाते है। पछेती बिजाई की हालत में पहली सिंचाई 3 सप्ताह के बजाए 4 सप्ताह बाद करे। 

बाद की सिंचाईया मध्य-फरवरी तक 25 से 30 दिन बाद और उसके बाद 20 दिन के अन्तर पर करनी चाहिए। जब शिखर जड़े निकलने लगे उस समय गेंहूँ की सिंचाई चुकनी नहीं चाहिए। अन्य अवस्थाओं की अपेक्षा इस समय सिंचाई न करने से पैदावार में भारी कमी हो जात्ती है। देर से फुटाव व फूल आते समय भी पानी देना नहीं भूलना चाहिए। 

दाने बनने के समय फसल में पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। इस अवस्था में पानी की कमी की वजह से दाने पूरी तरह विक्षित नहीं हो पाते इससे पैदावार पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। 

जहां चोये की स्थिति है, यानि भूमिगत जल का स्तर काफी ऊंचा है (150 सै.मि. या इससे कम) वहां गेंहूँ की पलेवा के बाद 1-2 सिंचाइयां ही करे पहली बिजाई के 25 दिन बाद दूसरी 85 दिन बाद।

निराई-गुड़ाई – wheat crop

भूमि में नमी संरक्षण व खरपतवारों के नियंत्रण के लिए पहली तथा दूसरी सिंचाई के बाद एक या दो गुडाईया करनी चाहिए। इस कार्य के लिए व्हील हो/ब्लेड हो का प्रयोग किया जा सकता है। गेंहूँ की संकरी पत्तियों वाले खरपतवार, जैसे मंडूसी या कनकी तथा जंगली जई आदि का खरपतवार नाशक दवाओं के प्रयोग से आसानी से नियंत्रण किया जा सकता है।

खाद व उर्वरक – Gehu ki kheti

मिट्टी की जाँच की आधार पर ही उर्वरक दे अन्यथा आम सिफारिशों के आधार पर खादों की मात्रा देनी चाहिए। विवरण आगे तालिका में दिया गया है। हस्तचालित यंत्र द्वारा भी उर्वरक खेत में बिखेरे जा सकते है। अच्छी पैदावार लेने के लिए एजोटोबैक्टर के तीन पैकेट प्रति एकड़ बीज के साथ मिलाकर बिजे। 

गेहूँ में जस्ते की कमी के लक्षण व उपचार

जस्ते की कमी के लक्षण :- Gehu ki kheti (pdf) wheat crop

लम्बे समय तक तापमान अधिक रहने पर कमी के लक्षण देर से प्रकट होते है। पत्तियों पर सफेद पीले धब्बो की उपस्थिति को जस्ते की कमी के लक्षण नहीं समझ लेना चाहिए, क्यूंकि गेंहूँ  में इसका विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। कुछ किस्मो में कमी के लक्षण पती के आधार से आरम्भ होते है। जस्ते की कमी के कारण फसल के पकने में लगभग 10-14 दिन की देर हो जाती है। 

उपचार:- भूमि में यदि जस्ते की कमी है, डी. टी. पि. ए. निष्कर्षणीय जस्ता 0.68 पी.पी.एम. से कम है तब कपास गेंहूँ फसल चक्र में 10-20 किल्लो ग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ कपास या गेंहूँ की बिजाई से पहले आखिरी जुताई पर खेत में बिखेर कर मिट्टी में मिला दें। कड़ी फसल में जस्ते की कमी के लक्षण प्रकट होने पर 0.5 प्रतिशत जिंक सल्फेट व 2.5 प्रतिशत यूरिया का घोल बना कर 15-15 दिन के अंतर पर दो स्प्रे करे। 

मुख्य उर्वरक संकेत | Gehu ki kheti (pdf)

  1. यदि गेंहूँ दालों या परती छोड़ने के बाद बोई जाये तब नाइट्रोजन की मात्रा 25% घटाए व ज्यादा पोषक तत्व खींचने वाली फसलों, जैसे बाजरा या ज्वार के बाद बोये तो मात्रा बढ़ाए। 
  2. हर रूप में मिलने वाली नाइट्रोजन बराबर फायदेमंद है। ऐसी खादों को बीज के साथ ड्रिल न करें। बोन से पहले खेत की तयारी की आखिरी जुताई पर इसे डाले। हलकी मिट्टी में यूरिया सिंचाई के बाद बतर आने पर डाले व गोड़ाई करके मिला दें। 
  3. हलकी मिट्टी में नाइट्रोजन दो बार की बजाय तीन बार डाले। 
  4. हलकी मिट्टी में नाइट्रोजन की कमी महसूस हो तो पूरा फुटाव होने पर व गाँठ बनने पर पूरक खाद के तोर पर 3% यूरिया के घोल का छिड़काव करें। 
  5. पानी में घुलनशील फास्फेट समान रूप से लाभदायक है। पानी में 80% से कम घुलनशील फास्फेटधारी उर्वरको का प्रयोग करें। 
  6. 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट को 20 किलोग्राम सुखी बारीक़ मिट्टी में मिलकर प्रति एकड़ डाले। इसे दूसरे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश वाले उर्वरको के साथ मिला कर डाल सकते है। जिंक सल्फेट घोल के रूप में छिड़का जा सकता है। 0.5% जिंक सल्फेट +2.5 किलोग्राम यूरिया या 0.25% चूना (मिश्रित) सिंचित जमनो में अच्छी पैदावार देने वाले किस्मो में पहला छिड़काव 15-15 दिन के अंतर पर करें। 
  7. नाइट्रोजन तथा फास्फोरस बाजार में मिलने वाले दूसरे उर्वरको द्वारा भी दिए जा सकते है। विभिन्न उर्वरको में इसके अंश इस प्रकार है – किसान खाद 25% ना., अमोनियम सल्फेट 20%ना., अमोनियम सल्फेट नाइट्रेट 26% ना., यूरिया 46% ना., डी. ए. पी. 18% ना., व 46% फास्फोरस, मोनो अमोनियम सल्फेट 20% ना., व 20%फास्फोरस 12 : 32 : 16 मिश्रण = 12% ना., 32%फास्फोरस तथा 16 पोटाश। 

गेंहूँ में बिमारियों के लक्षण व रोकथाम – wheat crop

बीमारियां व लक्षण                                 रोकथाम 

पीला रतुआ या धारीदार रतुआ :- पत्तो पर पीले रंग के छोटे-छोटे धब्बे कतारों में बन जाते है। कभी कभी ये धब्बे पतियों के डंठलों पर भी पाए जाते है। 
रोकथाम :- गेंहूँ की डब्ल्यू एच 157, डब्ल्यू एच 283, डब्ल्यू एच 291, डब्ल्यू एच 533, डब्ल्यू एच 542 व डब्ल्यू एच 896 किस्मो में पिला रतुआ कम लगता है। 

भुरा रतुआ या पत्तों का रतुआ :-नारंगी रंग के गोल धब्बे बेतरतीब रूप में पतियों व कभी-कभी पतियों की डंठलों पर बनते है जो बाद में काले रंग के हो जाते है। 
डब्ल्यू एच 283, डब्ल्यू एच 291, डब्ल्यू एच 542 व डब्ल्यू एच 896 किस्मे भूरा रतुआ रोगरोधी है। प्रति एकड़ 800 ग्राम जिनेब (डाईथेन जेड -78) या मैंकोजेब (डाईथेन एम 45) को 250 लीटर पानी में मिलकर छिड़कना चाहिए। पहला छिड़काव तब करें जब कहीं कहीं बीमारी नजर आये। बाद में 10 से 15 दिन के अंतर में 2 या 3 छिड़काव करें। यही छिड़काव पीला रतुआ के लक्षण दिखाई देते ही
करें। 
खुली कांगियारी :- गेंहूँ  की बालियान काले
पाउडर के रूप में बदल जाती है। रोगी पौधे में प्राय: बालियान निकलने से पूर्व सबसे ऊपरी पती 
(फ्लैग लीफ) पीली हो जाती है। 
1. धुप उपचार: मई-जून के महीने में किसी शांत एवं धूप वाले दिन प्राय: 8 से 12 बजे तक बीज को पानी में 4 घंटे भिगोने के बाद उसे पतली परत के रूप में (40 किलो बीज की मात्रा 15 वर्ग गज)
पक्की जमीन पर सूखा ले। इसे की भी वश्तु के साथ ढकना नहीं है। सुखाये बीज को बोन के समय तक किसी सूखे स्थान पर रखे। धुप उपचार के बाद किसी दवा उपचार की आवशयकता नहीं है। 
                        या 
उन्नत सौर ताप उपचार (सितम्बर माह में):  यदि किसी
कारणवश सौर ताप उपचार मई-जून माह में नहीं किया गया हो तो  सितम्बर माह में भी किसी शांत एवं धूप वाले दिन कर सकते है।
इस उपचार में 40 किलो बीज को 40 लीटर पानी में भिगोया जाता है। इसके लिए गैलबनाईज्ड टब (36″ x  36″ ऊपरी चौड़ाई, 24″ x  24″ – सतह की चौड़ाई, 13″-गहराई) उपयुक्त होगी। बीज को पानी में डालने के बाद टब के मुँह पर एक पारदर्शी पोलोथिन कश कर बांध दे और 8 बजे प्रातः से 2 बजे दोपहर तक धुप में ही रहने दें। 6 घंटे भिगोने  बीज को पानी से निकल ले और धुप में पतली
परत के रूप में पक्के फर्श पर फैला कर पूरी तरह सूखा ले। पूरी
तरह सूखे बीज को दांतों से तोड़ने पर कड़क की आवाज़ आनी
आएगी सुखाये बीज को बिजाई तक किसी सूखे स्थान पर रखें। इस उन्नत सौर ताप उपचार से गेंहूँ की खुली कांगयारी, पत्तो की
कांगयारी व करनाल बंट बिमारियों के बीज जन्य बीजाणुओं का
प्रभावी नियंत्रण हो जाता है। 
2. दवा उपचार : विटावैक्स या बैविस्टिन 2 ग्राम या टेब्यूफोनाजोल (रैक्सिल -2 डी. ऐस.) 1 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से सूखा 
करे ।
3. रोगी पौधे को दिखाई देते ही सावधानी पूर्वक निकाल कर जला या दबा दें।   
पत्तों पर कांगियारी :
पत्तों पर लम्बी काली धारियां नशों के साथ-साथ बनती है जो बाद में फट कर काला चूरन सा बन जाता है।  
1. विटावैक्स या बैविस्टिन 2 ग्राम या 
टेब्यूफोनाजोल (रैक्सिल -2 डी. ऐस.) 1 ग्राम प्रति किलो बिज की
दर से सूखा उपचार करें। 

2. रोगी पौधे को उखाड़ कर जला दे। 

3. रोगग्रस्त खेतों में रोगग्राही किस्मो की बिजाई बार-बार न करें। 

4. डब्ल्यू एच 283 व डब्ल्यू एच 896 रोगरोधी किस्मे है। 
करनाल बंट : रोग ग्रस्त दानो में काले रंग का
पाउडर बन जाता है व
इनसे सड़ी मछली जैसी गंध आती है। कहीं-कहीं बालियों में व कुछ दानो में इस बीमारी का प्रकोप होता है।   
1. बीज का थिराम 2 ग्राम या टेब्यूफोनाजोल (रैक्सिल -2 डी. ऐस.)      1 ग्राम प्रति किलो बिज की दर से सूखा उपचार करें।

2. रोगग्रस्त खेतों में रोगग्राही किस्मो जैसे एच डी 2009, एच डी
    2329 व एच डी 2285 की बिजाई बार-बार न करें। 

3. डब्ल्यू एच 283, डब्ल्यू एच 291, डब्ल्यू एच 533, डब्ल्यू एच 
    542 व डब्ल्यू एच 896 किस्मो में यह रोग कम लगता है।  



काला सिरा या ब्लैक पॉइंट : दानो के अंकुरण वाले स्थान के पास वाला भाग गहरा भूरा या काले रंग का हो जाता है।  फुल आने पकने तक फसल पर 
जिनेब (डाईथेन जेड -78) या मैंकोजेब (डाईथेन एम 45) का 800 
ग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से 10-15 दिन के अंतर पर छिड़काव
करें। 
चूर्णी या पाउडरी मिल्ड्यू : पत्तियों पर
सफेद या मटमैला चूर्ण सा बन जाता है। अधिक प्रकोप होने पर बालियान भी रोगग्रस्त हो जाती है।  
1. प्रति एकड़ 800-1000 ग्राम घुलनशील गंधक का छिड़काव
    करें। 
2. डब्ल्यू एच 283, डब्ल्यू एच 542, डब्ल्यू एच 896,किस्मो में
     यह रोग कम लगता है।  

कटाई-गहाई – Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

फसल की कतई के लिए बढ़िया दरातियों का प्रयोग करें। यदि हो सके तो ट्रेक्टर-चालित यंत्र का प्रयोग करें फसल की गहाई के लिए शक्तिचालित गहाई मशीन “थ्रैशर” का प्रयोग करना चाहिए अब ट्रेक्टर द्वारा चालित या स्वचालित ऐसे कम्बाइन-हार्वेस्टर भी उपलब्ध है जो कटाई और गहाई साथ-साथ करते है। 

शक्तिशाली थ्रैशर को चलाते समय निम्नलिखित सावधानिया बरते – wheat crop

  1. ऐसा थ्रैशर चुने जिसमे कटाई करने वाली फसल यांत्रिक विधि से स्वतः ही अंदर चली जाए। अधिकतर दुर्घटना थ्रैशर में हाथ से फसल की कटान देते समय ही होती है। थ्रैशर की लम्बाई कम से कम 90 सै.मी. होनी चाहिए तथा ढके हुए हिस्से की लम्बाई 45 सै.मी. से कम नहीं होनी चाहिए। 
  2. थ्रैशर पर काम करते समय किसी भी नशीली वस्तु का प्रयोग न करे। 
  3. गहाई की जाने वाली फसल अच्छी तरह सुखी हुई होनी चाहिए। 
  4. थ्रैशर के सभी पुर्जे अच्छी तरह से ढके हुए होने चाहिए। 
  5. थ्रैशर पर काम करते समय ढीले कपडे नहीं डालने चाहिए हाथ में किसी भी प्रकार का धागा या कोई भी धातु से बनाई गयी वस्तु ना डली हो, जैसे की कड़ा या कोई ब्रैसलेट। 
  6. चालाक को फसल की पूलियों को थ्रैशर की नाली में डालते समय अंदर तक हाथ नहीं देंना चाहिए।  
  7. पानी तथा रेत थ्रैशर के पास में ही रखे ताकि आग लगने पर आसानी से काबू पाया जा सके।
  8. यदि थ्रैशर पर गहाई ट्रेक्टर द्वारा की जा रही हो तो ट्रैक्टर की धुआँ निकलने वाली नाली पर चिंगारी रोधक का प्रबन्ध करे। 
  9. रात को काम करते समय रौशनी का प्रबंध रखे। 
  10. कार्य करने वाले स्थान पर फर्स्ट-ऐड-बॉक्स हमेशा साथ रखना चाहिए। 

भण्डारण | Gehu ki kheti (pdf) wheat crop

Gehu ki kheti (pdf )
Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop

भण्डारण के दौरान गेंहूँ की हानि को रोकने के लिए लोहे के ढोलो की सिफारिश की जाती है। ये ऐसे होते है कि बाहर के कीड़े अन्दर नहीं जा सकते और अंदर के कीटाणुओं को पलने व बढ़ने का मौका नहीं मिलता। ये अंदर ही मर जाते है। ये किफायती है, लाने ले जाने में आसान रहते है। 

सावधानियां : यदि गेंहूँ का भण्डारण ढोलो में करे तो कुछ बातों का ध्यान रखे। 

  1. टूटे दाने व अन्य चीज़ों से कीड़े लगने का खतरा बना रहता है इसलिए अनाज गेंहू को साफ करके ही भण्डारण करे। 
  2. पुराने दानो से भी कीड़े लगते है इसलिए भण्डारण के लिए तैयार वस्तु से पिछले अनाज के अंश निकाल दे साफ कर दे। 
  3. नमी वाले दाने न मिलाये नमी की मात्रा 10% से ज्यादा न हो। गेंहूँ  को धुप में खूब सूखा ले। 
  4. घर की खपत हेतु अनाज रखने के लिए मार्केट कमेटी स्टेट मार्केट बोर्ड 25 प्रतिशत अनुदान पर ढोल देता है। 
  5. थोक पर बेचने के लिए व गेंहूँ को स्टोर करने के लिए किसान भाई निम्न संस्थाओ पर संपर्क करें।  
  • राज्य का स्टेट वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन व क्षेत्रीय कार्यालय। 
  • केंद्रीय वेयर हाउसिंग कार्पोरेशन व क्षेत्रीय कार्यालय।
  • भारतीय खाद निगम व इसकी स्थानीय शाखाएं। 

उपज बढ़ाने सम्बन्धी संकेत – Gehu ki kheti

  1. खेत को अच्छी तरह से तैयार करें नमी पर्याप्त मात्रा में हो। 
  2. ऐसी किस्म चुने जो आपके इलाके के लिए लाभकारी घोषित की गयी हो। 
  3. पौध संरक्षण के लिए बीज व मिट्टी का उपयुक्त इलाज करे। 
  4. फसल को सही समय पर बोये। बताई गयी बीज की मात्रा ही डाले तथा बिजाई सही तरिके से करे। 
  5. अच्छे अंकुरण तथा अधिक पौधों के लिए बीज खाद ड्रिल का प्रयोग करे। 
  6. खेत की उर्वरता के आधार पर निर्धारित की गयी उर्वरक की मात्रा डाले। 
  7. खरपतवारों की समय पर रोक थाम करें। 
  8. फसल में सही समय पर सिंचाई करे। 
  9.  फसल की कटाई व गहाई सही समय पर करे ताकि फसल को दाने गिरने या खराब मौसम से हानि न हो। 

Conclusion | निष्कर्ष

Gehu ki kheti (pdf) – wheat crop | किसान भाइयो मैंने आपको गेंहू की खेती के बारें में यहाँ पूरी जानकारी उपलब्ध करने की कोशिश की है। अगर आपका कोई सवाल या सुझाव हो तो आप हमे कमेंट करके बता सकते है।

एक निवेदन – wheat crop

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